कृषि योग्य भूमि

जंगली भूमि, उपवन गन्ने के लिये कुडी बनाकर तैयार की जा सकती है। बेकार भूमि (पर्ती भूमि) घास के मैदान अक्सर बालू की अधिकता अथवा पुर्नविन्यास के अभाव में अनउपजाऊ भूमि के रूप में वर्गीकृत रहती है। अथवा पहाड़ी दर्रा(घाटी) की गिनती शामिल करके जिले की कृषि योग्य भूमि बडायी जा सकती है। सन् 1990-91 में जिले की कृषि योग्य भूमि 141624 हेक्टेयर्स थी। सन् 1990-91 के कृषि सर्वे के अनुसार 151838 हेक्टेयर्स कृल कृषि योग्य भूमि का बचा था। जो अधिकतर कृषि योग्य भूमि का कम है। कृषि योग भूमि की गणना में 05हे0 में 47.65 प्रतिशत से कम बची है। 0.5 और 01 हेक्टेयर के बीच 23.76 प्रतिशत और 1 से 2

विभिन्न फसल पैदा करना

एक क्षेत्र एक मौसम में एक से अधिक फसल पैदा करना अधिक लाभ देता है। इस प्रकार से यह अभ्यास सभी क्षेत्रों में मिटट्ी और पोष्टिकता को निश्चित रूप से बडा देता है। अगर मौसमी स्थिति अथवा बीमारी के कारण कोई फसल खतरे में है तो कुछ बढिया अवशाद दूसरी फसल के लिये है अगर विभिन्न्न पद्धति की फसले अपनायी जाती है जो अधिकतर बाजरा, उर्द अथवा मूंग, ज्वार, मॅूगफली, कुडी, गेहूॅ चना के साथ, मटर अथवा सरसों जौ के साथ चला। आलू समान्याता मेथी अथवा ब्याज के साथ बोया जाता है। फसल परिवर्तन करना पूर्णत्या उस जिले (क्षेत्र) के किसान पर निर्भर करता है। फसलों का वैज्ञानिकी परिवर्तन क्षेत्र खेत की उर्वकता और फसल की उत्पादकता बृ़िद्ध में किसान की सहायता कना है। वास्तव में यह अभ्यास साधणतया लाभा दायक है। जिले की सारी कृषि योग्य भूमि के लिये एक मौसम में एक विशेष फसल बोने के साथ दूसरी फसले भी बोयी जा सकती जो खेतों के लिये लाभदायक होने के साथ अच्छी अत्यधिक कमाई वाली भी है।एक क्षेत्र एक मौसम में एक से अधिक फसल पैदा करना अधिक लाभ देता है। इस प्रकार से यह अभ्यास सभी क्षेत्रों में मिटट्ी और पोष्टिकता को निश्चित रूप से बडा देता है। अगर मौसमी स्थिति अथवा बीमारी के कारण कोई फसल खतरे में है तो कुछ बढिया अवशाद दूसरी फसल के लिये है अगर विभिन्न्न पद्धति की फसले अपनायी जाती है जो अधिकतर बाजरा, उर्द अथवा मूंग, ज्वार, मॅूगफली, कुडी, गेहूॅ चना के साथ, मटर अथवा सरसों जौ के साथ चला। आलू समान्याता मेथी अथवा ब्याज के साथ बोया जाता है।

फसल परिवर्तन करना पूर्णत्या उस जिले (क्षेत्र) के किसान पर निर्भर करता है। फसलों का वैज्ञानिकी परिवर्तन क्षेत्र खेत की उर्वकता और फसल की उत्पादकता बृ़िद्ध में किसान की सहायता कना है। वास्तव में यह अभ्यास साधणतया लाभा दायक है। जिले की सारी कृषि योग्य भूमि के लिये एक मौसम में एक विशेष फसल बोने के साथ दूसरी फसले भी बोयी जा सकती जो खेतों के लिये लाभदायक होने के साथ अच्छी अत्यधिक कमाई वाली भी है। रवि में गेहूॅ बोने से पूर्व हरी खाद खरीफ के दौरान डालना भी काफी प्रसिद्ध है। जिले में धान गेंहूॅ, धान चना धान बनसीय, मकाई, गेहूॅ मकाई आलू गेहूॅ बाजरा गेहूॅ अथवा अलसी चना इन फसलो के साथ खतेी करने से कृषि उत्पादकता के साथ उर्वकता भी खेत भी बड जाती है। निम्नानुसार- -

First Year Second Year Third Year
                  Bajra &  Pea  Green manuring & Wheat -
                   Jowar & Arhar Cotton&  Peas -
Kharif  Sugar-cane  Green manuring   Cotton
Rabi    Sugar-cane   Wheat  Preparation for Sugar-cane

गन्ना साधारणत्या तीन साल लेता है। इस दौरान इसमें मकाई, आलू, (जल्दी, देर) और सीताफल जैसी फसलो को लगाकर खेत की उर्वरा शक्ति को बनाये रखती है और ये फसले एक साल का वक्त लेती है।

सिचाई के साधन

औरैया एक कृषि क्षेत्र है। जिले का मुख्य व्यवसाय कृषि है। इसलिये इसकी जमीन पर सिचाई के साथ की महत्ता बड़ जाती है। उत्पादन की स्वापन्तता और बडाने के लिये कृषि भूमि के लिये सिचाई के साथ और बडाने होगे ताकि कृषि भाग द्वारा और अधिक फसल उत्पादकता प्राप्त की जा सके।

इस जिले में जुताई के तरीके साधरणत्या वैसी ही जैसे अन्य जगहों के सिचाई के लिये पानी का प्रयोग नहरो से पाघर्व से होता है उपयोगी पैदावारी खरीब, रवी या बरसात की और जायद अधिक पैदावार के रूप में की जाती है। खरीब फसल आषाढ-सावन में बायेी जाती है आौर कुवार, कार्तिक में काटी जाती है। बरसात के मौसम के बाद खेत अच्छी तरह से रवि फसल की बुवाई के लिये तैयार हो जाते जिसकी बुवाई अक्टूबर में शुरू होती है। और मार्च, अप्रैल और मई तक काटी जाती है।

कृषि

फसलें

इस जिले में खेती के तरीकों आम तौर पर दोआब में की जाने वाली खेती के रूप में की जाती हैं। खाद के आवेदन और सिंचाई के लिए पानी का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जाता हैं खरीफ या शरद ऋतु, रबी या वसंत और हमदानी या अतिरिक्त फसल के रूप में सामान्यतः फसल मानी जाती हैं। खरीफ फसलों आषाढ़- श्रावन में और अक्टूबर से नवंबर यानी कार्तिक और आगहन में शुरू होती है और मार्च अप्रैल में काटा जाता है जो बारिश की समाप्ति पर आमतौर पर अच्छी तरह से पहले रबी सोविंग के लिए खेती की तैयारी के बाद क्वार-कार्तिक में काटी जाती है। मई में हमदानी सब्जियों और कम ग्रेड अनाज मार्च या अप्रैल में बोया जाता है और जून से पहले काटी जाती हैं. डबल फसल की प्रणाली सिंचाई के लिए सुविधाओं के मालिक जिले में काफी हद तक पीछा किया करते है। विभिन्न तहसीलों के लिए व्दिफसली क्षेत्र के आंकड़े किसी भी महान विविधताओं का प्रदर्शन नहीं करते हैं, लेकिन अनुपात में बिधूना और भरथना में सबसे अधिक हैं और अनुपात औरैया में सबसे कम है

प्रमुख फसल

खरीब की फसलें

खरीब फसले मुख्य अनाजो वाली है जैसे बाजरा, ज्वार धान और मकाई ये या तो अकेले अरहर के साथ, 1905 और 1907 के बीच बाजरा खरीब की फसल का 28.47 प्रतिशत या 42.511 हेक्टेयर भूमि अकेले या मिश्रित रूप से हो रहा था। हाल ही के सालों में बाजरा करीब 12900 हेक्टेयर जिले की कृषि क्षेत्र में बढा है। सन् 1380 फसली साल में 1973-34 में बाजरा 77.673 हेक्टेयर भूमि पर होता था। ज्वार साधरणत्या बढिया पैदा होता था। लेकिन बाजरा अरहर के साथ मात्र 5 प्रतिशत अनुपात में ही उगाया जाता था। ज्वार और बाजरा दोनो जून में असिंचित भूमि पर बोये जाते है। जिनको खेत जोत कर बोया जाता था।

रबी की फसलें

क्षेत्र औरैया जिले में रवी फसल के अनाजों में गेहूॅ सूची में सबसे ऊपर है। जो 1973-74 में रवी बुवाई में आधे से ज्यादा थाा। गेहूॅ अकेले और चला के साथ भी उगाया जाता है।

गेहूॅ जब चना के साथ बोया जाता है तो गोचनी कहलाता है। और जौ के साथ तब गुजाई कहलाता है। इसमें कोई सन्देह नही कि हाल के सालों में गेहूॅ की अकेले की पैदावार करने का क्षेत्र बढा है।

लेकिन पुरानी पद्धति अथवा मिश्रित फसल बोने का तरीका जिले का विशेष चित्र दिखता है। जिसने कभी निराश नही किया गेहूॅ फसल अच्छी उर्वकता की मिट्टी चाहता है। और खाद्य के अतिरिक्त ानी की मांग करता है। 1380 फसली साल में गेहूॅ 95860हेक्टेयर क्षेत्र में था।

नगदी फसलें

गन्ना, जमीन अखरोट, अलसी और निषेचित बीज, सब्जियों और फलों, तंबाकू, मीठे आलू, मसालों और मसाले जैसे तिलहन जिले के मुख्य गैर खाद्य फसलें हैं। वे विशेष रूप से कस्बों और बड़े गांवों के आसपास जिले के एक छोटे से क्षेत्र में मूल्यवान फसलों का गठन किया जाता है। हालांकि खरीफ सब्जियों में फिन्डी , पालक, बैगन आदि शामिल है, और रबी की फसल में गोभी, टमाटर, आलू, बैंगन और टी शलजम आदि शामिल है।

पिछले इंडिगो भी जिले में हो गया था, लेकिन पूरी तरह से सिंथेटिक रंगों में आने के साथ समय में गायब हो गया। अतीत में, अफीम एक महत्वपूर्ण गैर खाद्य फसल था

पोस्ता केवल सबसे अच्छा सिंचित और मनुर्ड गौहन भूमि पर हो, और कौशल और राजधानी के एक काफी राशि के लिए कॉल किया जा सकता है

मिट्टी के पोषक तत्वों

गोबर मुर्गी अपशिष्ट और थोडा टिकाऊ खाद्य किसानो द्वारा प्रयोग की जाती है। इटावा जिले में मिट्टी परीक्षण के बाद यह अनुभव किया गया कि मृदा में समान्यता नाइट्रोजन फास्फेट और पोटेशियम की विभिन्न डिग्री में कमी है। जिसको रासायनिक खाद्यों, हरी खाद्यों और गोबर के प्रयोग द्वारा दूर किया गया है। हरी खाद्य फसले जैसे , सनई डेचा और मूॅग मिट्टी में आवश्यक नाइट्रोजन की कमी को दूर करके उसकी उर्वरा शक्ति को बडाती है। यद्यपि रसायनिक उर्वरक महगे है फिर भी किसानों के बीच प्रसिद्ध है। जिले के किसानों द्वारा रासायनिक उर्वरकों में से यूरिया अमोनिया सल्फेट कैल्सियम, अमोनिया नाइट्रेट डाइअमोनियम फास्फेट, अमोनियम फास्फेट, सुपर फास्फेट और N.P.K. प्रयोग की जाती हे। रसायनिक उर्वरकों को एग्रों इण्डस्ट्री कार्पोरेशन एजेन्टों के अतिरिक्त अपरोक्ष दुकनदारों और कृषि से प्राप्त किया जाता है।