भाषा और लिपि

व्यवहारिक रुप से सम्पूर्ण आबादी की भाषा पश्चिमी हिन्दी के रुप में जानी जाती है। सन् १९८१ की जनगणना से पता चलता है कि यह भाषा लगभग ९६.८ प्रतिशत जनसंख्या के व्दारा बोली जाती थी। सन् १९७१ में हिन्दी भाषी व्यक्तियों का प्रतिशत ९६.४ था। पश्चिमी हिन्दी कई उपविभाजनों में विभाजित है। सन् १९८१ में हिन्दुस्तानी या उर्दू के रुप में जानी जाने वाली यह भाषा लगभग ३.१० प्रतिशत तथा सन् १९६१ में ३.३५ प्रतिशत इटावा के बाहर के अधिकांश लोगों व्दारा बोली जाती थी। जिले के यमुना पार, प्रान्तीय भाषा भदौरी रुप में जानी जाती है। जो बुन्देलखण्डी का एक रुप है और स्वयं हिन्दी की एक भाषा है। यह (भदौरिया राजपूत के घर) भदावर से अपना नाम उत्पन्न करती है। कुछ लोग पंजाबी, बंगाली और सिन्धी भी बोलते हैं। देव नागरी लिपि, हिन्दी और अपनी सहयोगी भाषाओं जैसे-गढवाली,कुमायनी आदि के लिये प्रयोग की जा रही है। उर्दू के लिए फारसी लिपि का प्रयोग किया जा रहा है। दूसरी भाषायें अपनी स्वयं की लिपि का प्रयोग कर रही हैं।

धर्म और जाति

सन् १९९१ में राज्य के ८३.७६ प्रतिशत आबादी की तुलना में हिन्दुओं की आबादी ९२.७९ प्रतिशत थी तथा राज्य के १५.४८ प्रतिशत आबादी की तुलना में मुस्लिमों की आबादी ६.६३ प्रतिशत थी। जिले की शेष आबादी के ०.५८ प्रतिशत में सिख,ईसाई,जैन और बौद्ध शामिल थे।

त्यौहार और मेले

हिन्दू त्यौहार

त्यौहारों की श्रृंखला शीतला अष्टमी से आरम्भ होती है। हिन्दू पंचांग के पहले महीने के आठवें दिन शीतला अष्टमी का त्यौहार मनाया जाता है। जिसमें देवी शीतला की पूजा की जाती है। माह के उज्जवल पखवाड़े के नौवें दिन को राम नवमी कहा जाता है। जिसमें भगवान राम का जन्मदिन बड़े आनन्द के साथ मनाया जाता है। लखना और दूसरे अन्य स्थानों में मेले आयोजित किये जाते हैं। ज्येष्ठ के दसवें दिन को गंगा दशहरा कहा जाता है, इसमें हिन्दू नदी में स्नान करते हैं। श्रावण माह के पाँचवें दिन नाग पंचमी मनायी जाती है, इसमें नाग देवता की फूल,चावल और दूध की भेंट के साथ पूजा की जाती है और इसी माह के पन्द्रवें दिन रक्षाबन्धन का त्यौहार मनाया जाता है। बहिनों के व्दारा अपने भाइयों के दाहिनी कलाई में राखी बाँधी जाती है। भाद्रपद माह के आठवें दिन भगवान श्री कृष्ण के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में जन्माष्टमी का त्यौहार मनाया जाता है। अश्विन के तीसवें दिन पितृ विसर्जन अमावस्या मनायी जाती है।

अश्विन माह में नौ दिनों तक दुर्गा पूजा चलती रहती है, जिसे नवरात्रि कहा जाता है और नौवें दिन को दुर्गा नवमी कहा जाता है। अगले दिन रावण पर राम की विजय के उपलक्ष्य में विजयाष्टमी की पूजा की जाती है। जिले के अनेक स्थानों पर रामलीला का आयोजन किया जाता है। कार्तिक माह के चौथे दिन को करवाचौथ कहा जाता है। इसमें सुहागिनें अपनी पतियों की दीर्घायु के लिये उपवास रखती हैं। दीपावली का त्यौहार कार्तिक माह के आखिरी पखवाड़े में मनाया जाता है परन्तु यह त्यौहार धनतेरस के साथ दो दिन पहले शुरु हो जाता है, जिसे दिव्य चिकित्सक धनवन्तिरि के जन्म दिन के रुप मनाया जाता है। त्यौहार के मु्ख्य दिन प्रत्येक हिन्दू का घर प्रकाशवान होता है और देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। दीपावली के तीसरे दिन भैया दूज मनाया जाता है। जिसमें स्त्रियाँ अपने भाइयों के माथे पर टीका लगाती हैं। इसी माह के आठवें दिन गोपाष्टमी मनायी जाती है, जिसमें गौमाता की पूजा की जाती है। बुढ़की का त्यौहार कार्तिक माह की पूर्णमासी को आयोजित किया जाता है। जिसमें लोग नदियों में स्नान करते है और जिले के अलग-२ स्थानों पर मेलों का आयोजन किया जाता है। सकट चौथ माघ माह के शुक्ल पक्ष के चौथे दिन होता है। जिसमें छोटे लड़के तिल के बने बकरे के नमूने को काटते है और उनकी माताएं व्रत रखती हैं।

भगवान शिव के मन्दिरों को विशेष रुप से सजाया जाता है। क्योंकि आर्य समाज के लोगों के लिए शिवरात्रि एक महत्वपूर्ण दिन है क्योंकि शिव के एक भक्त के बेटे और इस समाज के संस्थापक दयानन्द को इस रात ज्ञान प्राप्त हुआ था। वे इस दिन को ऋषि बुद्ध-सापथ के सप्ताह के रुप में मनाते हैं और विव्दानों व्दारा सात दिवस के लिये उपदेश दिया जाता है।

जिले में लगभग ६०१ वार्षिक मेलों का आयोजन होता है। अधिकांश त्यौहारों में स्थानीय छोटे बड़े मेले शामिल हैं। इसमें इटावा की प्रदर्शनी और पशु मेला महत्वपूर्ण है। इसमें लगभग दो लाख व्यक्ति आते हैं और दस हजार से पन्द्रह हजार तक पशु बिकते हैं।

मुस्लिम त्यौहार

मुस्लिम लगभग सभी महत्वपूर्ण त्यौहार मनाते हैं। लेकिन इनके त्यौहारों की संख्या सीमित है। महत्वपूर्ण त्यौहारों के नाम नीचे दिये गये हैं। इनके त्यौहार अशरा ( मोहर्रम) माह से आरम्भ होते हैं। यह त्यौहार मोहर्रम के १० वें दिन मनाया जाता है। मोहर्रम माह के पहले १० दिन पैगम्बर हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम के नवासे हजरत इमाम हुसैन रजिअल्लाह तआला अन्हा के व्दारा लड़ी गयी कर्बला की जंग और उनके साथियों की याद को समर्पित है। यह १० दिन शिया समुदाय गमी (शोक) के रुप में मनाते हैं। अशरा का आखिरी १० वाँ दिन बहुत महत्वपूर्ण है। जिसमें हजरत इमाम हुसैन रजिअल्लाह तआला को शहीद किया गया। ताजियों को जुलूस के रुप में कर्बला दफनाने के लिए ले जाया जाता है। चेहुल्लुम का त्यौहार सफर के २० वें दिन और अशरा के ४० वें दिन मनया जाता है। रबिउल अव्वल माह के १० वें दिन पैगम्बर हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम की विलादत (जन्म दिवस) के रुप मनाते हैं। जिसमें उनके जीवन के प्रवचनों और उपदेशों को बताने के लिये जलसे आयोजित किये जाते हैं। शाबान के १४ वें दिन शबे बारात सैयदना सरकारे अवैस करनी रजिअल्लाह जआला अन्हा की याद में मनाया जाता है। इसमें एक दूसरे को मिठाइयाँ बाँटी जाती है और गुजरे ( दिवंगत) हुए लोगों की रूह (आत्मा) की शान्ति के लिये फातिहा की जाती है। रमजान रोजों (उपवास) का त्यौहार है और इस माह की समाप्ति चन्द्रमा को देखने के साथ हो जाती है। चन्द्रमा के दिखने पर पहले शव्वाल व्दारा ईदगाह और मस्जिदों में नमाज पढ़कर ईदुल फितर का त्यौहार मनाया जाता है। लोग एक दूसरे से गले मिलकर बधाइयाँ देते हैं। ईदुल अजहा उनका आखिरी त्यौहार माह जिलहिज के १० वें दिन मनाया जाता है। यह त्यौहार पैगम्बर हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बेटे पैगम्बर हजरत इसमाईल अलैहिस्सलाम के बलिदान की भावना को समर्पित है। मुस्लिम ईदगाह में नमाज अदा करते हैं तथा भेड़ और बकरों की कुर्बानी करते हैं। इन त्यौहारों में एक खास व्यंजन सेवई खाई जाती है।

सिख त्यौहार

सिखों का महत्वपूर्ण त्यौहार गुरु नानक देव और गुरु गोविन्द सिंह का जन्म दिवस है। इसमें जुलूस निकालने का आयोजन होता है। गुरूव्दारों में सामूहिक प्रार्थना का आयोजन होता है और पवित्र ग्रन्थ "गुरु ग्रन्थ साहिब" पढ़ा जाता है। उनके त्यौहारों बैसाखी, लोहड़ी में स्थानीय मेले गुरुव्दारों में आयोजित किये जाते हैं।

ईसाई त्यौहार

ईसाईयों का महत्वपूर्ण त्यौहार क्रिसमिस २५ दिसम्बर को मनाया जाता है। गुड फ्राइडे का त्यौहार ईसा मसीह के क्रास पर चढ़ने और उनके पुनर्जन्म के लिये मनाया जाता है। नया वर्ष ०१ जनवरी भी उनके व्दारा मनाया जाता है और क्रिसमस त्यौहार नये वर्ष के साथ समाप्त हो जाता है।

जैन त्यौहार

महावीर के जन्म और अन्तिम तीर्थकर के निर्वाण के वर्षगाँठ को चैत्र के तेरहवें दिन तथा दीपावली के बाद मनाते हैं। परयूशन या पशालक्षनापर्व कार्तिक माह के आखिरी दिनों के दौरान फाल्गुन और असधा पवित्र दिवस हैं जिसमें भक्तगण व्रत रखते हैं और मंदिरों में पूजा करते हैं।

बौद्ध त्यौहार

बौद्धों का मुख्य त्यौहार बुद्ध पूर्णिमा, बैसाख के आखिरी दिन मनाया जाता है। जो बुद्ध के जन्म के साथ उसके निर्वाण का प्रतीक है।

आभूषण

पुरुष आभूषणों के अधिक शौकीन नहीं हैं। कभी-कभी वे अंगुलियों में सोने या चांदी की अंगूठी और गर्दन में एक पतली सी चेन पहनते हैं। महिलाएं आमतौर पर अपनी कलाईयों में कांच, चांदी या सोने की बनी चूड़ियाँ, अंगूठी, हार, नाक की कील, नथुनी, कान के बाले, पायल बिछुआ( केवल सुहागिन महिलाओं के लिए) कमर में पेटी पहनती हैं। निर्धन लोग आमतौर पर चांदी के गहने और धनी लोग सोने के गहने पहनते हैं और कभी-कभी मोती और हीरा जड़ित गहनों का प्रयोग करते हैं।

भोजन

गेहूँ लोगों का मुख्य भोजन है। अन्य सामग्री में सामान्य रुप से मक्का, जौ, चना. ज्वार भोजन हैं। गेहूँ या आटे से तैयार चपातियाँ आमतौर पर दाल या गुड़ और दूध के साथ खायी जाती हैं। यहाँ दालों में उड़द, अरहर, मूंग, चना, मसूर आदि का सेवन किया जाता है। मुख्य भोजन दिन में ०१ बजे किया जाता है। नाश्ते में चाय और भारतीय या पश्चिमी सामग्री शामिल होती है। रात में लोग हल्का भोजन लेते है। खाद्य पदार्थों में घी,वसा और सरसों का तेल अधिकांश प्रयोग किया जाता है। औरैया का घी अपनी शुद्धता के लिये बहुत प्रसिद्ध है। लोग अचार, चटनी व मगौड़ी के काफी शौकीन हैं, हालांकि मसालेदार आहार पसन्द नहीं करते है।

नृत्य और संगीत

लोक संगीत की लोकप्रिय किस्में बाहर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के माध्यम से प्रचलित है। उदाहरणार्थ- आल्हा, फाग, कजरी और रसिया इस जनपद में प्रसिद्ध हैं। साथ ही साथ वर्ष के अलग-अलग समय पर गाया जाता है। लोक गीतों में ढोला, उचारी और लंगड़िया गावों में बहुत आम है।

भजन, संगीत और नृत्य का प्रदर्शन जिले के ग्रामीण जीवन का एक नियमित हिस्सा है। बन्जसा नामक नृत्य जिले के ग्रामीणों का सबसे लोकप्रिय नृत्य है। विशेष रुप से गावों में पौराणिक कथाओं पर आधारित नौटंकी और नाटकों का अक्सर बड़े सम्मेलन में मंचन किया जाता है जो बड़ी भीड़ को आकर्षित करते हैं।

पोशाक

औरैया के लोग रंगीन और विभिन्न पोशाकें पहनते है। साड़ी, ब्लाउज, पेटीकोट सभी सम्प्रदायों की महिलाओं का सबसे पसन्दीदा पोशाक है। यद्यपि दुपट्टा, कु्र्ता, सलवार का प्रयोग मिला जुला देखने को मिलता है।

औरैया को खासतौर पर साड़ी के लिये भी जाना जाता है। यह सुन्दर पोशाक सामान्य रुप से ५ से ६ मीटर की लम्बाई और ०१ मीटर से अधिक की चौड़ाई का आयताकार परिधान है। यह बिना बटन और पिन से पहना जाता है। साड़ी के नीचे कसे छोटे ब्लाउज कंधे के ऊपर से पहनावे को पल्लू के नाम के जाना जाता है। साड़ियों की शैली, रंग और बनावट एक दूसरे से भिन्न होती हैं और सूती, रेशम या मानव निर्मित सामग्री से बनी हो सकती हैं।

भारतीय महिलाओँ का दूसरा पहनावा जिसे सलवार सूट के नाम से जाना जाता है उसमें कुर्ता, पायजामा के ऊपर पहना जाता है। पायजामा को पतलून की तरह कमर और टखनों से कसा हुआ पतलून, चूड़ीदार पायजामा के रुप में जाना जाता है। यह पोशाक मुस्लिम और पंजाबी महिलाओं एवं अविवाहित हिन्दू लड़कियों के बीच लोकप्रिय है। बिना कालर या कालरदार कुर्ता चूड़ीदार पायजामा, पुरुषों और महिलाओं दोनों में लोकप्रिय है।

गांव के लोग कुर्ता, लुंगी, धोती और पायजामा का प्रयोग करते हैं। बिना कालर का खादी कुर्ता ( नेहरु जैकेट) भी लोकप्रिय है। मुस्लिम महिलाएं परम्परागत बुर्का पहनती हैं और पुरुष सिर पर गोल टोपी का इस्तेमाल करते हैं।